एक बार की बात है । इंग्लैंड का राजा मर गया ।
चारों ओर नया राजा बनाने के चर्चे चल रहे थे । लेकिन उत्तराधिकारी के रूप में किसी
योग्य व्यक्ति को ही चुना जा सकता था । जो कि एक विकट समस्या थी । क्योंकि हर कोई
व्यक्ति राजा बनने के लिए तैयार था ।
इंग्लैंड का राजपुरोहित मर्लिन बड़ा ही
बुद्धिमान व्यक्ति था । वह ऐसे व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में चुनना चाहता
था, जो इंग्लैंड के इतिहास में एक नायक की भूमिका अदा करें । जिसमें सभी सद्गुणों
का समावेश हो । ऐसे परिपूर्ण व्यक्तित्व से संपन्न व्यक्ति को राजा के रूप में
चुनना लगभग असंभव था । लेकिन मर्लिन के लिए कुछ भी असंभव नहीं था । मर्लिन यह जानता
था कि यदि किसी अयोग्य व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया तो निश्चय
ही वह एकाएक प्राप्त संपत्ति का दुरुपयोग करेंगा ।
आखिर ऐसे व्यक्ति के चुनाव के लिए मर्लिन को
एक अनोखी युक्ति सूझी । उसने लोहे की निहाई (लोहे का बड़ा टुकड़ा) में एक तलवार
घुसेड़ दी और उसे एक बहुत बड़े सभागार में रखवा दिया ।
दुसरे दिन उस सभागार में सबको
आमंत्रित किया गया । सबके सामने उसने यह घोषणा की कि “ यह तलवार इस जादुई निहाई में
गाढ़ी गई है । यह निहाई दिव्य है । इस तलवार को केवल वही व्यक्ति निकाल सकता है, जो
सत्यवादी, ईमानदार, राज्य के प्रति वफादार, साहसी, प्रजा का रक्षक और जनता का शुभचिंतक
हो । जिसमें यह सभी गुण विद्यमान हो और जिसे स्वयं पर इतना विश्वास हो, वह व्यक्ति
आगे आये और इस विकट परीक्षा को उतीर्ण करें । जो इस तलवार को बाहर निकाल लेगा, वही
इस राज्य का उत्तराधिकारी होगा” यह सुनते ही सभी हट्टे – कट्टे नौजवान अपने बल का
परिक्षण करने की सोचने लगे । उत्तराधिकारी बनने की उमंग में सभी शक्तिशाली लोग आगे
बढ़ने लगे ।
लेकिन मर्लिन थोड़ा रुककर फिर बोला – “। लेकिन इतना
ही नहीं । जो तलवार निकालने में असफल होगा, उसे देशद्रोही समझा जायेगा और फांसी की
सजा दी जाएगी ।” यह सुनते ही ज्यादातर लोग पीछे हट गये । वो सोचने लगे कि निहाई
ठहरी जादुई, अगर सच में तलवार नहीं निकली तो बेवजह जान से हाथ धो बैठेंगे । राजा बनने
के लालच में कौन फालतू की आफत को मौल ले । सबके सब जिन्हें अपनी सच्चाई, ईमानदारी
और वफ़ादारी पर संदेह था, पीछे हट गये ।
तब राजपुरोहित मर्लिन बोला – “ क्या हमारे
राज्य में ऐसा कोई आत्मविश्वासी नहीं, जिसे अपनी सच्चाई, ईमानदारी और वफ़ादारी पर पूरा
भरोसा हो ?” यह शब्द तीर की तरह सभा में बैठे आर्थर नाम के एक सैनिक को चुभ गये । उसने
जीवनभर अपने सैनिक कर्तव्य का अच्छे से पालन किया था । उसे अपनी सच्चाई, ईमानदारी
और वफ़ादारी पर पूरा विश्वास था । यह ऐलान उसकी वफ़ादारी को चुनौती थी । अतः वह उठकर
सामने आया ।
उसने मन ही मन सोचा कि “यदि तलवार निकलती है
तो राजा बनकर प्रजा की सेवा करूंगा और यदि नहीं निकलती है तो मेरी वफ़ादारी में कमी
थी, यह समझकर सजा को स्वीकार करूंगा ।”
आर्थर को देखकर राजपुरोहित मर्लिन की आंखे चमक
उठी । उसने सोचा कोई तो धुरंदर सामने आया, जिसे मैं राजा बना सकूं । उसने आर्थर का
स्वागत करके उसे तलवार की ओर भेज दिया ।
आर्थर ने जाकर एक झटके में तलवार निकाल दी ।
इस तरह वह इंग्लैंड का राजा बना । सभी ओर प्रजा में ख़ुशी की लहर दोड़ गई क्योंकि उन्हें
आर्थर जैसा सच्चा, ईमानदार और वफ़ादार शासक जो मिला था । इतिहास गवाह है कि आर्थर सच्चाई,
न्याय, बुद्धिमानी और वफ़ादारी में विक्रमादित्य के समान ही विख्यात हुआ ।
शिक्षा – इतिहास के इस प्रेरणादायक प्रसंग से
एक बड़ी ही महत्वपूर्ण बात सीखने को मिलती है । जीवन में परेशानियों और प्रलोभन के
जो अवसर मिलते है, प्रकारांतर से वह ईश्वर द्वारा ली गई हमारी परीक्षा ही है ।
ईश्वर हमारे सामने घोषणा करता है कि अगर तू इसके काबिल है तो अपनी काबिलियत सिद्ध
कर । इसलिए दोस्तों ! कामयाबी के पीछे दोड़ो, काबिल बनो । काबिल बन गये तो कामयाबी खुद
ब खुद आपके पीछे दोड़ेगी ।
दूसरी सीख इस कहानी से यह मिलती है कि काबिल
होना ही काफी नहीं है। बल्कि हमें अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा भी होना चाहिए ।
कभी – कभी भरोसा ही वह अंतिम गुण होता है जिस पर हमारी पूरी काबिलियत टिकी होती है
। जैसाकि इस दृष्टान्त में आर्थर के साथ हुआ ।
कोई इंसान अपने जीवन में सफल तब होता है, जब उसे इतना आत्मविश्वास हो कि यदि जीने मरने का प्रश्न भी हो तो वह संकोच न करें ।
किंग आर्थर के आत्मविश्वास की कहानी
Reviewed by Unknown
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मई 25, 2018
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