एक बार एक नवयुवक ने आत्मबोध करने के लिए महात्मा
बुद्ध से दीक्षा ली । उसने दीक्षा तो ले ली लेकिन कई दिन बीतने पर भी उसे आत्मबोध
नहीं हुआ । प्रतिदिन वो बुद्ध के उपदेश सुन – सुनकर बोर होने लगा । आखिर एक दिन
उसने सोचा कि “ ये सब पागल है जो बार – बार उन्हीं उपदेशों को सुनते रहते है ।
इससे कोई ज्ञान प्राप्ति नहीं होनी ।” आखिर उसके सब्र के बांध टूट ही गया और वह
तथागत के पास गया और बोला – “ भगवान् ! आप मुझे परमज्ञान दे सकते है तो बताइए, अन्यथा
मैं यह सब छोड़ रहा हूँ ।”
बुद्ध ने कहा – “ जरुर छोड़ देना, लेकिन जाते –
जाते एक कहानी सुनते जाओ ।”
बुद्ध ने कहानी सुनानी शुरू की । एक बार की
बात है, किसी नगर में दो धनी सेठ रहते थे । दोनों ही के पास अतुल्य धन – वैभव था ।
दूर – दूर तक दुसरे नगरों में उनकी संपन्नता के किस्से मशहूर थे । अपने अपार धन –
वैभव को लेकर उन दोनों में आपस में होड़ लगी रहती थी ।
वो अक्सर बाजार में ही मिलते थे । एक दिन पहला
सेठ पहली बार दुसरे सेठ के घर गया तो उसने देखा कि दूसरा सेठ एक विशाल और सुन्दर, तीन
मंजिले मकान में रहता था । जबकि पहले सेठ का मकान इससे कम सुन्दर और दो मंजिला ही
था । उस नगर में सेठ का तीन मंजिला मकान चारों दिशाओं में कहीं से भी देखा जा सकता
था । यह आलिशान मकान देखकर पहले सेठ को बड़ा अचम्भा हुआ । वह खुद को दुसरे सेठ से
छोटा महसूस करने लगा । उसके अहंकार को बड़ी ठेस लगी ।
विचार ने इच्छा का रूप लिया और इच्छा को
आकांक्षा बनते देर न लगी । पहले सेठ ने तुरंत उससे भी सुन्दर और बड़ा मकान बनाने का
निश्चय किया । सेठ से मिलने और आतिथ्य ग्रहण करने के बाद वह अपने घर चल दिया ।
रास्तेभर उसके दिमाग में दुसरे सेठ का तिमंजिला मकान घूम रहा था ।
जैसे ही वह घर पहुंचा, उसने तुरंत अपने सेवक को
नगर के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकार को बुलाने के लिए भेजा ।
वास्तुकार (कारीगर) आया तो
सेठ ने उससे कहा – “ मुझे पड़ोसी नगर के सेठ के जैसा ही सुन्दर और तिमंजिला मकान
चाहिए, जितनी जल्दी हो सके, उतना जल्दी बनाओं ।” और उसी दिन काम शुरू करने को कहा ।
कारीगर गया और मजदुर बुला लाया और काम शुरू कर
दिया । उसने सबसे पहले नींव खोदनी शुरू की । पूरा दिन नींव के गड्ढे खोदने में चला
गया । क्योंकि मकान तिमंजिला बनाना था अतः गड्ढे भी गहरे खोदने थे ।
जब शाम को सेठ काम का मुआयना करने आया तो उसने
देखा कि “ कारीगर ने बहुत गहरे गड्ढे खुदवाये है । ऐसे तो काफी दिन लग जायेंगे ।”
उसने तुरंत कारीगर को बुलाया और पूछा – “ इतने
गहरे गड्ढे किसलिए है ?”
कारीगर बोला – “ सेठजी ! तिमंजिला मकान बनाना
है तो नींव भी मजबूत होनी चाहिए, उसके बाद पहली मंजिल और दूसरी मंजिल भी मजबूत
होनी चाहिए । समय तो लगेगा लेकिन मैं काम अच्छा करना चाहता हूँ, ताकि आपको कोई
शिकायत का मौका न मिले ।”
सेठ ने कहा – “ मुझे सीधे तिमंजिला मकान चाहिए
। नींव और पहले, दुसरे की तुम चिंता न करो ।”
कारीगर ने कहा – “ यह संभव नहीं है, सेठजी ।”
सेठ बोला – “ बना सकते हो तो बोलो वरना मैं
कोई दूसरा कारीगर देखता हूँ ।”
कारीगर ने कहा – “ सेठजी ! नींव के गड्ढे गहरे
खोदे बिना मैं ये तिमंजिला मकान नहीं बना सकता । आप चाहे तो दूसरा कारीगर देख
लीजिये ।”
सेठ ने नाराज होकर कहा – “ ठीक है तुम जाओ, मैं
कोई दूसरा देख लूँगा ।” इतना सुनते ही वह कारीगर काम छोड़कर चला गया ।
अब महात्मा बुद्ध उस शिष्य से पूछा – “ क्या
उस सेठ का तिमंजिला मकान किसी कारीगर ने बनाया होगा ?”
तब शिष्य बोला – “ भगवान् ! वो सेठ मुर्ख है ।
उसे इतना भी नहीं पता कि बिना गहरी और मजबूत नींव के भी कोई मकान बनाया जा सकता
है, भला !”
बुद्ध बोले – “ हाँ ! वो सेठ तो मुर्ख है ही, लेकिन
मुझे वैसा ही एक सेठ मेरे सामने बैठा दिखाई दे रहा है, जो मुझसे गुण – कर्म –
स्वभाव की मजबूत नींव बनाये बिना ही परमज्ञान की तीसरी मंजिल बनाने का आग्रह कर
रहा है ।”
इतना सुनते ही शिष्य बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा
।
महात्मा बुद्ध का उपदेश | परमज्ञान की तीसरी मंजिल
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जून 08, 2018
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